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Haunted Bhangarh Fort Alwar

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प्रेतवाधित भानगढ़ का किला अलवर

भानगढ़ का किला सरिस्का के जंगलों से घिरा हुआ होने के साथ-साथ अपने आप में कई रहस्यमय कथाओं और डरावने इतिहास को समेटे हुए है.

इस किले को भारत के ही नहीं बल्कि एशिया के सबसे डरावने स्थानों में शुमार किया जाता है. इस किले का जर्रा-जर्रा एक अनजानी सी कहानी कहता है.

डर का आलम तो यह है कि शाम के छः बजे के पश्चात यहाँ पर कोई नहीं रहता है. इस सम्बन्ध में पुरातत्व विभाग ने बाकायदा चेतावनी का बोर्ड भी लगा रखा है.

How to reach Bhangarh

जयपुर से भानगढ़ दो रास्तों के जरिये जाया जा सकता है. एक रास्ता जमवारामगढ़ से आंधी ग्राम होकर जाता है. इस रास्ते से जाने पर भानगढ़ की दूरी लगभग 77 किलोमीटर है.

दूसरा रास्ता जयपुर आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग से दौसा होकर है. इस रास्ते से जाने पर भानगढ़ की दूरी लगभग 86 किलोमीटर है. जैसे ही हम किले के पास पहुँचते है तो मन रोमांच से भरने लग जाता है.

किले के हनुमान प्रवेश द्वार से कुछ दूरी पर वाहनों की पार्किंग के लिए स्थान बना हुआ है. दाहिनी तरफ कुछ दूरी पर एक बड़ा मकबरा स्थित है जिसके पास में एक या दो छोटे मकबरों के अवशेष भी हैं.

जंगल के बीच में पहाड़ियों से घिरा हुआ यह किला एक परकोटे से सुरक्षित किया गया है.

Gates of Bhangarh

इस परकोटे के अन्दर प्रवेश करने के लिए पाँच द्वार बने हुए हैं जिन्हें उत्तर से दक्षिण की ओर क्रमशः अजमेरी, लाहोरी, हनुमान, फूलबारी एवं दिल्ली द्वार के नाम से जाना जाता है.

हनुमान द्वार से प्रवेश करते ही हनुमानजी का मंदिर आता है. हनुमानजी का आशीर्वाद लेकर आगे जाने पर मोदों की हवेली (Modon Ki Haveli) सहित अन्य कई अवशेष नजर आते हैं.

यहाँ के अवशेषों में प्राचीर, द्वार, बाजार, हवेलियाँ, मंदिर, शाही महल, छतरियाँ और मकबरा आदि प्रमुख है.

Haunted jauhari Bajar in Bhangarh

यहाँ से आगे जाने पर एक बाजार आता है जिसमे दुकानों के अवशेष नजर आते हैं. ये अवशेष सड़क के दोनों तरफ एक कतार में है और एक समानता लिए हुए हैं. इस बाजार को जौहरी बाजार के नाम से जाना जाता था.

जौहरी बाजार के आगे जाने पर बड़े-बड़े और डरावने पेड़ मौजूद हैं जिन्हें देखकर डरावना अहसास होता है. इसके आगे एक बड़े दरवाजे को पार करने पर सामने बड़ा सा मैदान आता है.

Temples without Idols in Bhangarh

इस दरवाजे के दाँई तरफ एक ऊँचे चबूतरे पर गोपीनाथ मंदिर बना हुआ है. गोपीनाथ मंदिर के अलावा यहाँ के मुख्य मंदिरों में सोमेश्वर, केशव राय एवं मंगला देवी के मंदिर हैं जो नागर शैली में बने हुए हैं.

यहाँ के मंदिरों की ख़ास बात यह है कि ये सभी प्रतिमा विहीन हैं.

आगे बाँई तरफ एक सुन्दर कुंड बना हुआ है जिसको पार करने पर सोमेश्वर मंदिर बना हुआ है. इस कुंड से कुछ दूरी पर ही एक हवेली बनी हुई है जिसे पुरोहित जी की हवेली के नाम से जाना जाता है.

कुंड के पास खड़े होकर देखने पर यह स्थान अत्यंत रमणीक और कल्पनाशील प्रतीत होता है. उस समय की कल्पना करने मात्र से ही वह दौर अपने चारों तरफ नजर आने लग जाता है.

ऐसा लगता है जैसे राजकुमारी रत्नावती अपनी सखियों के साथ कुंड को पार करके सोमेश्वर मंदिर की तरफ जा रही हो.

Palace in Bhangarh

यहाँ से आगे एक दरवाजे को पार करने के बाद में शाही महल का प्रवेश द्वार नजर आता है. इस महल के दाँई तरफ बहुत से केवड़े के फूल लगे हुए हैं.

शाही महल को सात मंजिला माना जाता है लेकिन अब इसकी चार मंजिले ही शेष है. शाही महल के आगे एक पूरी बस्ती बसी हुई थी जिसे तीन प्राचीरों से सुरक्षित किया गया था.

अन्दर महल में चारों और खँडहर ही खंडहर है. अब इसे मनोदशा कहो या यहाँ के वातावरण का असर, ये सभी खंडहर कई जगह काफी डरावने प्रतीत होते हैं. महल के नीचे कई तहखाने बताए जाते है जिनसे कई डरावनी कहानियाँ जुडी हुई हैं.

Mysterious Kevada flowers

इस किले में दिन के समय में भी एक अजीब सा और भारीपन का सा अहसास होता रहता है जिसे केवड़े के फूलों की खुशबू और रहस्यमय बना देती है.

सैलानियों के साथ-साथ तांत्रिक क्रिया करने वाले लोग भी यहाँ पर आते रहते हैं. तंत्र साधना करने वाले यहाँ चोरी छिपे साधना करते हैं. ऊपर पहाड़ी पर बनी छतरी तांत्रिक क्रिया करने वालों की मुख्य जगह बताई जाती है.

यह स्थान मशहूर पर्यटक स्थल होने के साथ-साथ फिल्म और सीरियल की शूटिंग के लिए भी एक शानदार लोकेशन है. अब तक इस किले में कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है.

Who built Bhangarh fort?

अगर हम इस किले के इतिहास की बात करे तो पता चलता है कि भानगढ़ के किले का निर्माण राजा भगवंतदास ने 1573 ईस्वी में करवाया था जिसे बाद में इनके पुत्र एवं राजा मानसिंह के भाई माधोसिंह ने अपनी राजधानी बनाया.

गौरतलब है कि माधोसिंह मुग़ल सम्राट अकबर के दरबार में दीवान थे. माधोसिंह के पश्चात इनके पुत्र छतरसिंह ने यहाँ की बागडोर संभाली. इनके पश्चात इनके पुत्र अजबसिंह ने यहाँ की गद्दी संभाली.

Ajabgarh fort nearest to Bhangarh

भानगढ़ क्षेत्र में पानी की कमी होने के कारण अजबसिंह ने यहाँ से कुछ किलोमीटर की दूरी पर अजबगढ़ नामक किला बनवाया. इस क्षेत्र में पर्याप्त पानी उपलब्ध था. अजबसिंह ने भानगढ़ के स्थान पर अजबगढ़ को अपनी रिहाइश बना लिया.

मुगलों के बढ़ते प्रभाव के कारण बाद में यहाँ के शासक राजपूत से मुसलमान बन गए जिसमे मोहम्मद कुलीन ने भानगढ़ और मोहम्मद दलहीज ने अजबगढ़ की सत्ता संभाली.

आमेर के शासक जयसिंह ने भानगढ़ और अजबगढ़ पर 1720 ईस्वी में आक्रमण करके उसे आमेर रियासत का हिस्सा बना लिया. इस युद्ध में भानगढ़ और अजबगढ़ के दोनों मुस्लिम शासक मारे गए.

Stories about Rani Ratnavati

भानगढ़ के तबाह होने के पीछे तीन किस्से बड़े मशहूर है. पहले किस्से के अनुसार यहाँ की राजकुमारी रत्नावती अत्यंत सुन्दर थी. सुन्दर होने के साथ-साथ वह तंत्र विद्याओं की भी जानकार थी.

इस राजकुमारी पर सिन्धु सेवड़ा उर्फ सिंघि‍या नामक तांत्रिक मोहित हो गया और राजकुमारी को पाने के तरह-तरह के जतन करने लगा. जब उसके सभी प्रयास असफल रहे तो उसने राजकुमारी को तंत्र साधना से पाने का निश्चय किया.

इस कार्य के लिए उसने एक दिन बाजार से राजकुमारी के लिए इत्र लेने गई दासी को किसी प्रकार अभिमंत्रित इत्र दे दिया. जब दासी ने वह अभिमंत्रित इत्र राजकुमारी को दिया तो राजकुमारी समझ गई कि यह इत्र वशीकरण मंत्र अभिमंत्रित है.

राजकुमारी ने उस इत्र का प्रयोग एक पत्थर पर किया जिससे वह पत्थर उस तांत्रिक की तरफ चल पड़ा और उसने तांत्रिक को कुचलकर मार डाला.

मरते समय तांत्रिक ने भानगढ़ को कभी भी आबाद ना रहने का श्राप दे दिया जिसके फलस्वरूप यह शहर उसी रात्रि को बर्बाद हो गया.

दूसरे किस्से के अनुसार यहाँ पर बालूनाथ नामक एक साधू रहते थे.

जब भानगढ़ के किले का निर्माण हुआ तब उन्होंने राजा को चेतावनी दी थी कि किले की ऊँचाई कभी भी इतनी अधिक नहीं होनी चाहिए कि उनका तप स्थल उसकी छाया में ढक जाए अगर ऐसा हुआ तो नगर तबाह हो जाएगा.

कालांतर में राजाओं ने साधू की बात पर ध्यान नहीं दिया और किले की ऊँचाई इतनी बढ़ा दी कि बालूनाथ का तप स्थल किले की छाया में ढक गया. साधू के सिद्ध वचनों के कारण भानगढ़ तबाह हो गया.

तीसरे किसे के अनुसार 1720 में आमेर के राजा जयसिंह ने भानगढ़ के मुस्लिम शासक को परास्त कर इस पर अपना अधिकार जमाया.

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पानी की कमी तो यहाँ पर सदैव थी ही साथ ही वर्ष 1783 में एक भयंकर अकाल की वजह से यह किला पूरी तरह से उजड़ गया.

अगर आस पास के लोगों की माने तो उपरोक्त तीनों किस्सों में से तांत्रिक के श्राप वाले किस्से में सच्चाई मानी जाती है और भानगढ़ के बर्बाद होने के पीछे भी तांत्रिक का श्राप माना जाता है.

कुछ लोग मानते हैं कि श्राप के कारण जो लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए थे उनकी आत्माएँ आज भी भानगढ़ के खंडहरों में भटकती है.

अगर आप घूमने फिरने के शौकीन है और आप भानगढ़ के किले के रोमांच को महसूस करना चाहते हैं तो आपको एक बार भानगढ़ जाकर उस रोमांच का अनुभव अवश्य करना चाहिए.

About Author

Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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