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famous havelis of sikar

Famous Havelis of Shekhawati

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शेखावाटी की प्रसिद्ध हवेलियाँ

राजस्थान की धरती अपनी सांस्कृतिक विरासत एवं ऐतिहासिक धरोहरों की वजह से सम्पूर्ण विश्व में अपना अलग ही स्थान रखती है.

जगह-जगह पर स्थित किले, बावड़ियाँ, छतरियाँ एवं हवेलियाँ अपनी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत का जीता जागता सबूत है. राजस्थान में शेखावाटी क्षेत्र मुख्यतया अपनी हवेलियों, छतरियों एवं बावडियों के लिए सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है.

Why Shekhawati is called Open Art Gallary of Rajasthan?

इस सभी विरासतों में शेखावाटी की हवेलियों की एक अलग ही पहचान है. यहाँ की हवेलियों पर शोध करने के लिए विश्व के कई देशों के लोग नियमित शेखावाटी में आते रहते हैं.

अपनी इन धरोंहरों की वजह से शेखावाटी क्षेत्र को “ऑपन आर्ट गैलरी ऑफ राजस्थान (Open Art Gallary of Rajasthan)” के नाम से भी जाना जाता है.

Havelis in Shekhawati

यूँ तो सम्पूर्ण शेखावाटी क्षेत्र में ही ये हवेलियाँ बनी हुई है परन्तु रामगढ़, मण्डावा, पिलानी, सरदारशहर, रतनगढ़, नवलगढ़, फतेहपुर, मुकुंदगढ़, झुन्झुनू, महनसर, चूरू आदि शहरों में इनकी भरमार है.

इन प्रसिद्ध हवेलियों में झुन्झुनू शहर में टीबड़ेवाला की हवेली तथा ईसरदास मोदी की हवेली, मण्डावा में सागरमल लाडिया, रामदेव चौखाणी तथा रामनाथ गोयनका की हवेली, डूंडलोद में सेठ लालचन्द गोयनका, मुकुन्दगढ़ में सेठ राधाकृष्ण एवं केसर देव कानोड़िया की हवेलियाँ, चिड़ावा में बागड़िया की हवेली, डालमिया की हवेली तथा महनसर में सोने-चाँदी की हवेली शामिल है.

सीकर शहर में गौरीलाल बियाणी की हवेली, रामगढ़ में ताराचन्द रूइया की हवेली, फतेहपुर में नन्दलाल देवड़ा, कन्हैयालाल गोयनका की हवेली श्रीमाधोपुर में पंसारी की हवेली, लक्ष्मणगढ़ में केडिया एवं राठी की हवेली, चूरू में मालजी का कमरा, रामनिवास गोयनका की हवेली, मंत्रियों की हवेली, सुराणा की हवेली शामिल है.

Why havelis in shekhawati are so famous?

सेठ साहूकारों द्वारा निर्मित ये कई मंजिला हवेलियाँ अपनी भव्यता एवं स्थापत्य कला के साथ-साथ अपनी कलात्मकता के लिए भी जानी जाती हैं.

इन हवेलियों के झरोखों, बरामदों, छज्जों एवं बाहरी दीवारों पर बारीक़ नक्काशी के साथ-साथ भित्ति चित्र मौजूद हैं. कई हवेलियों के भित्ति चित्र तो 200 वर्षों से अधिक प्राचीन हैं.

इन हवेलियों की दीवारों पर चित्रकारी करने के लिए अराइस की आलागीला पद्धति का इस्तेमाल किया गया है. इन भितिचित्रों के विषय मुख्यतया दैनिक जीवन के क्रियाकलाप, सामाजिक एवं धार्मिक उत्सव, देवताओं, फूल पत्तियों आदि से ही सम्बंधित होते थे.

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इन चित्रों को दीवार पर चूने का प्लास्टर करते समय बनाया जाता था. गीले प्लास्टर पर प्राकृतिक रंगों का लेप बनाकर चित्रकारी की जाती थी. जैसे-जैसे प्लास्टर सूखता था वैसे-वैसे ये रंग भी फैलने की बजाए अंदर तक जड़ पकड़ कर लेते थे.

देख रेख के अभाव में अधिकतर हवेलियाँ जर्जर होकर अपना अस्तित्व खो रही है. सरकार के साथ-साथ आम जनता को भी इनके अस्तित्व को बचाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए.

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Ramesh Sharma
M Pharm, MSc (Computer Science), MA (History), PGDCA, CHMS

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